हरियाणा में 17 साल के करन ठाकुर ने ब्लू व्हेल गेम के दुष्चक्र में फंसकर खुदकुशी

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हरियाणा में 17 साल के करन ठाकुर ने ब्लू व्हेल गेम के दुष्चक्र में फंसकर खुदकुशी कर ली। राज्य में इस तरह का यह पहला दुखद हादसा है। मध्यप्रदेश के राजगढ़ में भी एक किशोर ने आत्महत्या की तैयारी कर ली थी, सौभाग्य से उसकी शिक्षिका ने उसे बचा लिया। दसवीं के छात्र रमेश को धमकी दी गई थी कि यदि उसने गले में फंदा लगाकर नहीं देखा तो उसके माता-पिता को मार डाला जाएगा। खेल के नाम पर किशोरों के लिए कैसा मकडज़ाल है, जो उन्हें मौत के मुंह में कूद पडऩे को मजबूर कर देता है। आगरा की दो किशोरियों को घर से भागने की बेहूदी चुनौती दे दी गई, जिसे पूरा करने के लिए वे पंजाब मेल में जा बैठीं।
जोखिम उठाने या हिम्मत दिखाने के धोखे में फंसकर खुद अपने ही हाथों जीवन खत्म करने का जंजाल भारत में आधा दर्जन से ज्यादा और पूरी दुनिया में करीब 100 किशोरों की जान ले चुका है। यह नकली रोमांच किशोरों को जीवन की हकीकत से दूर, फैंटेसी की दुनिया में ले जाकर तबाह कर देता है।
ब्लू व्हेल गेम भारत के लिए भले ही एक नई समस्या है, लेकिन रूस में यह काफी दिन से किशोरों के लिए खतरा बना हुआ है। इसको 2013 में ईजाद भी रूस की ही एक 17 साल की लड़की ने किया, जो अब जेल में है। उस लड़की के साथ ही एक ऐसे शख्स को भी पकड़ा गया है जो इस काम में मददगार था और इस किशोरी को गेम में जोडऩे के लिए नए-नए रोमांचक खतरों का ‘आइडियाÓ देता था।
मौत के इस खेल में केवल किशोरों को ही जोड़ा जाता है। इस मकसद के लिए सोशल मीडिया पर पहले एक ग्रुप बनाया जाता है। जो एक-दूसरे को नए रोमांच के लिए उकसाते हैं। सब हमराज बन जाते हैं। उन्हें धमकाया भी जाता है। एक बार इस कथित खेल के चंगुल में फंसने के बाद ‘एडवेंचरÓ के कौतूहल की उम्र के ये किशोर अपनी टोली के अन्य सदस्यों से सम्बन्ध तोडऩे की हिम्मत नहीं कर पाते और सम्मोहन जैसी हालत में वही करते चले जाते हैं, जो उनसे कहा जाता है। इस खेल का चक्र 50 दिन में पूरा होता है। इसमें 50 करतब पूरे करने होते हैं, इसके लिए नई-नई चुनौतियां दी जाती हैं। कई बार किशोर को अपने परिवार के सदस्य की हत्या करने तक की चुनौती दी जाती है। किशोरों से कब्रिस्तान में जाकर रात बिताने, डरावनी फिल्में देखने, दिल दहलाने वाले गाने सुनने, किसी नजदीकी को मरते हुए देखने और फिर ऊंची इमारत से छलांग लगाने को उकसाया जाता है।
कई यूरोपीय देश किशोरों को इसके चंगुल में फंसने से बचाने के उपायों पर विचार कर रहे हैं। फ्रांस और ब्रिटेन आदि देश इसे रोकने के लिए अपने विभागों को निर्देश दे चुके हैं।
मुंबई के अंधेरी (पूर्व) में 14 साल के एक लड़के ने सातवीं मंजिल से कूदकर खुदकुशी कर ली। इसी तरह बंगाल के पश्चिम मिदनापुर जिले में 15 वर्ष के एक किशोर ने गला बांधकर आत्महत्या कर ली। कोलकाता के 19 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को उसके दोस्तों और अध्यापकों ने काफी कोशिशों के बाद अपनी जान लेने से रोका। तमिलनाडु के मदुरै में 19 वर्ष के छात्र ने गले में फंदा डालकर खुदकुशी कर ली। उसके बाएं हाथ पर व्हेल का चित्र बना हुआ था। वहीं से तीन अन्य बच्चों के आत्महत्या करने की भी खबर है। केरल से भी इसी तरह की एक घटना की जानकारी मिली है। एक लड़के को खुदकुशी से बचा लिया गया तो उसने दूसरी बार भी ऐसी ही कोशिश की। उत्तर प्रदेश में 13 साल के पार्थ सिंह नाम के छठवीं कक्षा के छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
इस समस्या से निपटना है तो उसका जिम्मा सोशल साइट्स चलाने वाली कम्पनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। समाजशास्त्रियों को आगे आना चाहिए और उन कारणों को दूर करने के उपाय सुझाने चाहिए जिनके रहते किशोर अपना अकेलापन दूर करने, मनोरंजन करने या नए दोस्त बनाने के नाम पर इस चक्रव्यूह के चंगुल में फंस जाते हैं।
समाजशास्त्री पड़ताल करें कि आखिर वे कौन सी परिस्थितियां हैं, जो बच्चे को एकान्तप्रिय बनाती हैं, उसको अकेलापन महसूस कराती हैं, उसे अपने परिवार, दोस्त और समाज से दूर ले जाती हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर मालूम कर लिया गया तो किशोर जीवन से सम्बंधित अनेक समस्याओं को हल करने की चाबी हमारे पास होगी। हम उनकी स्कूली कठिनाइयों, पढ़ाई से जुड़ी परेशानियों और घर-परिवार की मुश्किलों का समाधान भी आसानी से कर सकेंगे। मगर जब तक हम किशोरों के पारिवारिक वातावरण, सामाजिक सम्बंधों, निजी जीवन और शिक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल नहीं करेंगे, तब तक ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता।

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