मुसीबत में ईमानदारी को दुआ-सलाम

Spread the love

ईमानदारी भी एक बला ही है, जिसके गले पड़ी तो बस पड़ ही गयी। वही एक दिन गले की फांस बन जाती है। जबकि इसकी सगी बहन बेईमानी हाय-हैलो करने वालों के भी गले का हार बनकर रहती है। इस दुनियादारी में ईमानदारी की कदर भी रत्ती भर की है! बेईमानी की कदर ही कदर है। बेईमानी को तो बिना कार्य के भी हाथ जोड़कर नमस्कार करते हैं और ईमानदारी को तो मुसीबत में भी दुआ-सलाम नहीं करते हैं।
आप खुद ही देख लीजिए। सौ में से ज्यादा बेईमानी के ही अनुयायी मिलेंगे। वे भी ईमानदारी को कोसते हुए और बेईमानी का गुणगान करते हुए मिलेंगे। फिर भी ईमानदारी परवाह नहीं करती है। बल्कि इतराती हुई चलती है।
इतना भी नहीं सोचती-समझती है जिसकी सरकार होती है उसी की जय-जयकार होती है। बेईमानी की तो हर सरकार में सांठगांठ होती है। नेताओं की तो यह खास है। उनके साथ उठना-बैठना इसकी दिनचर्या का हिस्सा है। राजनीति से जुड़े हुए इसके कई किस्से हैं।
ईमानदारी का हमारा भी एक परम मित्र परम भक्त है। उसके तो रक्त में भी ईमानदारी कूट-कूटकर भरी है। ब्लड बैंक वाले भी उसके द्वारा किया रक्तदान नहीं लेते हैं। लेकर क्या करें? उसके ब्लड ग्रुप का ब्लड लेने कोई आता ही नहीं। वह दिनभर में दो ही काम करता हैं। पहला वक्त की कद्र करना सिखाता है और दूसरा ईमानदारी का पाठ पढ़ाता है। जिससे उसका घर खर्च भी नहीं चल पाता है। बीवी-बच्चे समझाते भी खूब है। ईमानदारी में क्या रखा है? सिर्फ और सिर्फ भलाई। भलाई से पेट नहीं भरता है। बेईमानी का दामन पकड़ ले, कमाई ही कमाई है। मैं भी बड़ा होने के नाते खूब समझाता हूं। मैं तूझ से बड़ा हूं, तेरे भले के लिए कह रहा हूं। इतना सुनते ही वह कविता करने लग जाता है। बड़ा हुआ तो,क्या हुआ।
मित्र को कौन समझाए! जि़ंदगी की पुस्तक में ईमानदारी का जो पाठ होता है। वह बड़ा दुरूह होता है। जल्दी से हर कोई पढ़ ही नहीं सकता है। अगर किसी ने ईमानदारी का पाठ पढ़ भी लिया तो उसको याद नहीं हो पाता है और किसी ने मन लगाकर याद भी कर लिया तो कंठस्थ नहीं होता है और किसी ने दृढ़ निश्चय करके कंठस्थ भी कर लिया तो उसे हर रोज एक नई परीक्षा देनी पड़ती हैं। इसलिए लोग ईमानदारी का पाठ पढऩे के बजाय बेईमानी की कहानी पढऩे में रुचि रखते हैं।
बेईमानी की कहानी में नकल नानी, जुगाड़ मामा और रिश्वत परियों की कहानी होती है। जो कि एक बार पढऩे पर ही मुंहज़बानी रहती है, जिनको सुनाकर कम से कम घर गृहस्थी का खर्च तो आसानी से निकाल ही सकता है। लेकिन जिस पर ईमानदारी का भूत सवार होता है। वह सौ बार फेल हो जाए तो भी ईमानदारी के पढ़े हुए पाठ पर ही चलेगा। मगर जब तक जीएगा तब तक ईमानदारी की ही माला फेरता रहेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *