बीजेपी अपने सहयोगी दलों के प्रति काफी उदार रुख

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झुक कर बचाए साथी
लोकसभा चुनाव के लिए सीटों के तालमेल में बीजेपी अपने सहयोगी दलों के प्रति काफी उदार रुख अपना रही है। बिहार में जेडीयू के सामने पूरी तरह झुक जाने के बाद उसने महाराष्ट्र में शिवसेना से समझौते में भी काफी लचीला रुख अपनाया है। इससे एक बात तो स्पष्ट है कि बीजेपी की नजर में 2019 का चुनाव 2014 से बिल्कुल अलग है। तालमेल के तहत शिवसेना को लोकसभा में 23 सीटें मिली हैं जबकि 2014 में 22 मिली थीं। इस तरह एक सीट बढ़ाकर बीजेपी ने उसे संतुष्ट करने की कोशिश की है। बाकी 25 सीटों पर बीजेपी लड़ेगी। दोनों ने विधानसभा चुनाव भी मिलकर लडऩे का फैसला किया है, जहां दोनों बराबर सीटों पर लड़ेंगी। अपने लिए हाशिये वाले राज्यों में बीजेपी नए साथी भी खोज रही है।
तमिलनाडु में वह एआईडीएमके के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी, जहां गठबंधन में उसे पांच सीटें मिलने की बात कही जा रही है। पीएमके से समझौता एआईडीएमके पहले ही कर चुकी है। बीजेपी इस गठजोड़ में डीएमडीके को भी शामिल कराना चाहती है। पिछले साल तीन राज्यों में सत्ता खोने के बाद पार्टी को लगने लगा है कि सिर्फ मोदी के आकर्षण और अमित शाह के प्रबंधन पर निर्भर रहना चुनाव में भारी पड़ सकता है। वह देख रही है कि कांग्रेस किस तरह छोटे-बड़े सारे राज्यों में गठबंधन पर जोर दे रही है। ऐसे में बीजेपी की सोच यह है कि ज्यादा से ज्यादा सीटें खुद लेकर हार जाने से अच्छा है कि काफी सीटें सहयोगियों को देकर जीतने पर जोर दिया जाए। अगर वह लोकसभा चुनाव में बहुमत से पिछड़ती है तो एनडीए के फॉर्म्युले पर सरकार बनाई जा सकती है। इसी को ध्यान में रखकर उसने बिहार में अपनी जीती हुई सीटें भी जेडीयू को दे दी।
वहां बीजेपी और जेडीयू को 17-17 सीटें मिली हैं जबकि रामविलास पासवान की एलजेपी छह सीटों पर लडऩे जा रही है। गौरतलब र्है ीि को तीन सीटों पर जीत मिली थी। जेडीयू ने सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ा था लेकिन जीत उसे महज दो सीटों पर हासिल हुई थी। इस तरह बीजेपी ने वहां कुल 13 सीटों का त्याग किया, जिनमें पांच पर उसके सांसद हैं। कहने को आज भी केंद्र में गठबंधन सरकार ही चल रही है पर सहयोगियों को कोई भाव नहीं दिया जाता। यह सरकार बीजेपी की और उससे ज्यादा मोदी की लगती रही है। सरकार के कामकाज में सहयोगियों का असर चुनावी तालमेल के बाद भी नहीं दिख रहा। जिस तरह विपक्ष एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम की बात कर रहा है, एनडीए के साथ वैसा कुछ नहीं है। बीजेपी के सहयोगी दल मनमाफिक सीटें पाकर ही खुश हैं। अगली सरकार से भी कोई भिन्न नीतिगत अपेक्षा उनकी नहीं है।

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