अनाथों की तरह जीवन यापन करने को मजबूर हैं दीपक व देविका

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रुद्रप्रयाग। लोगों के घरों में साफ सफाई और दुकानों में गंदगी साफ कर दो गरीब बच्चे पेट की भूख को मिटा रहे हैं। दो वक्त की रोटी के लिए उन्हें संघर्ष करना पड़ रहा है। जिस उम्र में इन बच्चों के हाथ में खिलौने और मनोरंजन के साधन होने चाहिए थे, उस उम्र में वे खुद ही मेहनत करके अपना गुजर बसर करने को मजबूर हैं। दुख की बात यह है कि बच्चों के पिता दिमागी संतुलन खो चुके हैं तो मां बच्चों को छोड़कर कई चली गई है। जीवन के अंतिम पड़ाव की यात्रा कर रही उनकी दादी भी उनके लिए कुछ नहीं कर पा रही है। ऐसे में ये दोनों बच्च्चे अनाथों की तरह जीवन यापन करने को मजबूर हैं। जर्जर भवन में दादी के साथ दोनों बच्चे रह रहे हैं। बच्चों की दिनचर्या काफी आश्चर्यजनक है। सुबह उठकर बच्चे पहले प्राथमिक विद्यालय जवाड़ी को जाते हैं और फिर स्कूल से घर आने के बाद लोगों के घरों व दुकानों में साफ-सफाई करके अपने लिए खाने का जुगाड़ करते हैं। दीपक की उम्र दस साल है तो देविका आठ साल की है। दीपक कक्षा पांचवी का छात्र है और देविका दो की कक्षा में पढ़ती है। दोनों भाई-बहिन स्कूल से आने के बाद लोगों के यहां काम करके खाने को जुगाड़ ढूंढते हैं। घर की माली हालत इतनी खराब है कि प्रशासन और शासन के साथ ही सरकार ने भी इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया है। बच्चों के पिता सुरेन्द्र लाल कुछ साल पहले ही दिमागी संतुलन खो बैठे हैं। पैंसे न होने के कारण उनका इलाज भी नहीं हो पाया है, जिस कारण वह धीरे-धीरे पूरी तरह से ही अपना संतुलन खो बैठा। बच्चों के पिता पागलों की तरह गांव में भटकते रहते हंै और दादी गंगी देवी की वृद्धावस्था होने के कारण घर में ही रहती हैं। बच्चों के पिता सुरेन्द्र लाल ने दो शादियां की, जिससे पहले पत्नी से उसे कोई भी बच्चा नहीं है। जबकि दूसरी पत्नी से चार बच्चे हुए। सुरेन्द्र के पागल होने के बाद बच्चों की मां दो बच्चों को अपने साथ ले गई, जबकि दो बच्चों को दादी के पास छोड़ गई। कई साल गुजर चुके हैं, लेकिन उनकी मां आज तक लौटकर नहीं आई। बच्चे आज भी अपनी किस्मत को कोसते हुए मां को याद करते हैं और उस दिन का इंतजार करते हैं जब उनकी मां उनके पास वापस आ जाय। जर्जर भवन में किसी तरह बच्चे अपने दादी के साथ रह रहे हैं। बच्चों को इस बात की भी चिंता सताती है कि कभी कोई बड़ा हादसा न हो जाय और वे जर्जर भवन के नीचे दबकर खत्म न हो जांय। ग्रामीण रवि कप्रवाण ने बताया कि जवाड़ी गांव में ये दो बच्चे स्कूल पढऩे के बाद अपने पेट की भूख मिटाने के लिए लोगों के घरों व दुकानों में साफ-सफाई का काम करते हैं, जिससे ग्रामीण इन्हें खाने को दे देते हैं। बच्चों के पिता मानसिक संतुलन खो चुके हैं और पागलों की तरह गांव में भटकते रहते हैं। घर की दुर्दशा ऐसी बनी है कि यहां रहना किसी खतरे से खाली नहीं है। उन्होंने कहा कि बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं, जिससे उनकी पढ़ाई हो पा रही है। बच्चों के पास पहनने को अच्छे कपड़े तक नहीं है। फटे कपड़ों में बच्चे स्कूल जाते हैं और घर में भी फटे जूते और कपड़ों में रहते हैं। बच्चों और दादी के सामने खाने की गंभीर समस्या बनी हुई है। प्रशासन को इस ओर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। वहीं जिलाधिकारी मंगेश घिल्डियाल ने कहा कि जवाड़ी गांव में अनाथ बच्चों की हरसंभव मदद की जायेगी। इन्हें संस्थाओं के जरिये राशन और पहनने के लिए कपड़े दिलाए जायेंगे। साथ ही इनकी आर्थिक मदद भी की जायेगी।

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